राजकिय भूमि/सिवायचक भूमि पर अतिक्रमण के विरूद्ध कार्यवाही/ एल.आर. एक्ट 1956 की धारा 91/ 91 के तहत कार्यवाही
राजकिय भूमि/सिवायचक भूमि पर अतिक्रमण के विरूद्ध कार्यवाही/ एल.आर. एक्ट 1956 की धारा 91/ 91 के तहत कार्यवाही /भूमि का अप्राधिकृत अधिभोग:
कोई भी व्यक्ति, जो विधिपूर्ण प्राधिकार के बिना किसी भूमि को अपने अधिभोग में लेता है अतिचारी समझा जायेगा और तहसीलदार द्वारा किसी भी समय, स्वप्रेरणा से या ऐसे स्थानीय प्राधिकारी द्वारा आवेदन-पत्र देने पर, जिसके कि अधिकार में ऐसी भूमि है, उससे बेदखली किया जा सकेगा।
राजकिय भूमि/सिवायचक भूमि/ गोचर भूमि/ विभागीय भूमि पर किये गये अतिक्रमण संबंधी मामलों में तहसीलदार (भूमिधारी) को राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 91 के तहत कार्यवाही करने अधिकार प्रदान किये गये।
ऐसे मामलों में जहां अतिक्रमी द्वारा पश्चात्वृति अतिक्रमण कर लिया गया है इस संबंध में राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 91 की उपधारा 91(2) में प्रावधान है कि तहसीलदार के आदेश द्वारा ऐसी अवधि के सिविल कारावास, जो तीन माह तक हो सकेगा तथा शास्ति जो कि वार्षिक लगान का 50 गुणा तक हो सकेगी।
धारा 91(2) में यह भी प्रावधान है कि द्वितीय अतिक्रमण या इसके बाद के करने पर अतिक्रमी को माह तक के लिए सिविल कारावास के दण्ड से दण्डित किया जा सकता है। इस प्रावधान के उपयोग करने से पहले आवश्यक भी है कि अतिकमी को भौतिक रूप से बेदखल किया जाये।
धारा 91(6) मे यह प्रावधान है कि तहसीलदार द्वारा अतिक्रमण हटाये जाने के नोटिस देने के बावजूद 15 दिन के अन्दर अतिक्रमी अलग नहीं छोड़ता है तो दोषसिद्धि पर साधारण कारावास से एक माह से कम होगा किन्तु 3 वर्ष तक हो सकेगा और जुर्माने से जो बीस हजार रुपये तक हो सकेगा की सजा से दण्डित किया जा सकता है।
धारा 91 (6) (ख) में यह प्रावधान भी है कि जिला कलक्टर के लिखित आदेश के बावजूद यदि राज्य सरकार का कोई कर्मचारी जानबूझकर अथवा जानकारी में होते हुए भी इस प्रकार के अनाधिकृत कब्जे को रोक पाने / हटाने में लापरवाही बरतता है तथा जानबूझकर गैर कानूनी कब्जे को नहीं हटाता है तो उसे एक माह का कारावास या 1000/- का जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जा सकता है परन्तु उक्त प्रावधानों का उपयोग अपवाद स्वरूप ही किया जाता है जबकि कठोर प्रावधान करने का उद्देश्य से यह था कि अतिक्रमण की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके।
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